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corona in india: why lockdown will be imposed due to others carelessness

देशभर में कोरोना महामारी अपना विकराल रूप धारण कर चुकी है। बात इतनी बिगड़ चुकी है कि अब मुंबई जैसे अकेले एक शहर में 10 हजार से ज्यादा, महाराष्ट्र जैसे एक राज्य में 57 हजार से ज्यादा और पूरे देश में एक लाख से ज्यादा कोरोना मरीज रोजाना मिलने लगे हैं। पिछले 4 दिनों से पूरी दुनिया में एक दिन में सबसे ज्यादा कोरोना केस हमारे भारत में आ रहे हैं। जो अमेरिका डेली कोरोना केसेस के मामले में एक समय हमसे कोसों आगे था, आज हमने उसे भी पीछे छोड़ दिया है।

जैसे हालात हैं हमें तो अपने घरों में तीन-तीन दरवाजे अंदर बंद होकर रहना चाहिए था। मगर आप मुंबई में हों, चाहे महाराष्ट्र में या देश के किसी भी कोने में, बस अपने घर के बाहर निकलकर देखिए, क्या लग रहा है देश पर इतनी बड़ी आपदा आई हुई है? बस एक चीज आपको देश में कोरोना संकट का अहसास करा सकती है… किसी चाय या पान की दुकान पर चले जाइए, करीब 10 से 15 लोग भीड़ लगाए ये चर्चा करते हुए मिल जाएंगे कि क्या देश में कहीं फिर से तो लॉकडाउन नहीं लग जाएगा। सबको पूरी-पूरी आशंका है कि अगले कुछ दिनों में देश में लॉकडाउन लगने वाला है। और जब लगेगा तब देखा जाएगा, रह लेंगे घर में भी…जैसे रहे थे पिछले साल।

Visitors crowd at the Juhu beach amid Covid-19 coronavirus pandemic in Mumbai on April 4, 2021. (Photo by Sujit Jaiswal / AFP)

मगर क्या लॉकडाउन से यह आपदा खत्म होने के कोई आसार हैं? नहीं… पिछले साल लगे लॉकडाउन से देश को जो आर्थिक नुकसान हुआ है उससे उबरने में जाने कितने साल लग जाएंगे। देश में जितना अच्छा सब दिख रहा है, उतना असल में है नहीं। पिछले साल लगे लॉकडाउन ने लाखों लोगों की नौकरियां छीन ली, लोग बेघर हो गए, अच्छे-खासे परिवार बिखर गए। छोटे कामगारों, दुकानदारों, रिक्शा-ठेलिया चलाने वालों को हुए नुकसान की तो कभी चर्चा भी नहीं होती। देश कहीं से भी दूसरा लॉकडाउन सहने की हालत में नहीं है।

और लॉकडाउन लगाएं भी तो किसके लिए…उनके लिए जो कोरोना को ‘बेवकूफी’ मान चुके हैं? या उनके लिए जो सीना ठोंककर कहते हैं कि भाई एक साल हो गया कोरोना को, मगर तुम्हारे भाई ने मास्क को मुंह से टच नहीं होने दिया…या उनके लिए जो ये मानकर बैठे हैं कि कोरोना-वोरोना कुछ नहीं है, सरकार और लैब वाले मिलकर लोगों को ठग रहे हैं। अमीर आदमी को पॉजिटिव बता देते हैं और गरीबों को निगेटिव…ये तो महज उदाहरण भर हैं। अपने आसपास देखिए, कोरोना को लेकर ऐसी-ऐसी अफवाहें जोरों पर हैं कि सुनकर हंसी भी आती है और उन लोगों की सोच पर अफसोस भी होता है। अफसोस इसलिए कि कल को ये इसी हीरोगिरी में इस बीमारी के शिकार होंगे और अगर किसी जटिलता की वजह से इनकी जान चली गई तो इनके पीछे इनके अपनों का क्या होगा। मन करता है इन्हें उन 1,65,138 लोगों के परिवार से मिलाया जाए जिनकी कोरोना से जान चली गई।

कोरोना के खौफ से ज्यादा अपनी ‘आजादी’ को तरजीह देने वालों पर अनीस अंसारी का यह शेर फिट बैठता है कि-

मैं ने आँखों में जला रखा है आज़ादी का तेल
मत अंधेरों से डरा रख कि मैं जो हूँ सो हूँ

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लॉकडाउन लगाकर देश को दोबारा गहरे आर्थिक संकट में धकेलना समझदारी भरा कदम नहीं होगा। जिन्हें अपनी और अपने परिवार की जान प्यारी है वो सावधानी बरतेंगे ही, जिन्हें लगता है कि ‘कोरोना फोरोना कुछ नहीं होता है’ उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए। कोविड मरीज मिलने पर बड़ा कंटेनमेंट जोन बनाना और सबकी टेस्टिंग करना, मार्केट का समय निर्धारित करना, सड़कों पर ज्यादा से ज्यादा पुलिसबल उतारकर सख्ती से मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे नियमों का पालन करवाने जैसे उपायों पर ही फिलहाल अमल करना चाहिए।

लोगों के मन में सरकार के लिए भी गुस्सा है और वो इसलिए कि जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, वहां हर पार्टी का नेता सीना ठोंककर अपनी रैली में आई हजारों-लाखों की भीड़ को दिखा रहा है। इस लाखों की भीड़ में इक्का-दुक्का नेताओं और सुरक्षाकर्मियों को छोड़कर कोई मास्क नहीं लगाए होता है। जबकि वहीं दूसरे ‘नॉन चुनावी राज्यों’ में सख्ती का तो ये आलम है कि बाइक पर एक गरीब परिवार के दो लोग जा रहे हों और उनमें से कोई एक मास्क न लगाए हो, तो पुलिस चालान काटती ही है, लगे हाथ गाल भी बजा देती है। कार के चारों शीशे बंद कर कोई जरूरी काम से अकेला जा रहा हो और मास्क न लगाए हो, उसके साथ भी ऐसे बर्ताव किया जाता है कि जैसे कोई बहुत बड़ा क्राइम करके आ रहा हो। इसमें न पब्लिक की गलती है, न कानून का पालन कराने वालों की, दोष है तो इस दोहरे मापदंड को अपना रहे हमारे नेताओं का…जिन्हें एक ओर रैलियों में भीड़ इकट्ठा कर अपना दमखम भी दिखाना है और दूसरी तरफ मास्क न पहने अकेले आदमी को 10 पुलिसवालों के बीच घिरवाकर डंडे भी मरवाना है।

यह इस ‘सीजन’ की शुरुआत भर है, आपदा आगे और वीभत्स होने की पूरी आशंका है क्योंकि लोगों ने कोरोना वायरस को वायरस जैसा कुछ मानना ही छोड़ दिया है। उन्होंने मास्क न लगाने के तरह-तरह के बहाने ढूंढ रखे हैं। मगर अगर आप ये पढ़ रहे हैं तो आपसे गुजारिश है…हम बहुत बड़े संकट के दौर से गुजर रहे हैं, सरकार और लोगों की देखादेखी में मत पड़िए। जरा सी लापरवाही से आपको कोरोना हुआ और कोई अनहोनी हुई तो न ये लोग हाल पूछने आएंगे, न सरकार आपके घर झांकने आएगी और मास्क न लगाने वाली आपकी मर्दानगी परिवार के किसी काम की रह जाएगी।

बाकी जैसा तारिक मतीन ने कहा है-

मौत बर-हक़ है तो फिर मौत से डरना कैसा
एक हिजरत ही तो है नक़्ल-ए-मकानी ही तो है

(बर हक़~ सच, हिजरत~ प्रवास, नक़्ल-ए-मकानी~ किसी दूसरी जगह जाना)

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं




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