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interstate river disputes in india: river disputes in india news in hindi : केन-बेतवा का झगड़ा तो सुलझ गया, लेकिन इन नदियों के जल बंटवारे पर अब भी है विवाद

सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने केन-बेतवा लिंक परियोजना से संबंधित दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। हालांकि, देश में कई अंतरराज्यीय जल विवाद अब भी सुलझाने बाकी हैं। इनमें रावी-व्यास का जल विवाद, कृष्णा नदी जल विवाद, बसंधरा नदी जल विवाद और महादाई जल विवाद प्रमुख हैं। इनके अलावा, यमुना नदी जल विवाद, पेरियार नदी जल विवाद, सतलुज-यमुना लिंक नहर विवाद भी हैं जिनपर राज्यों के बीच सुलह नहीं हो पाई।

​रावी-व्यास जल विवाद

पंजाब विधानसभा ने मुख्यमंत्री की पहल पर जुलाई 2004 में अप्रत्याशित कदम उठाया और पिछले सभी अंतरराज्यीय नदी जल समझौतों को निरस्त कर दिया। तब केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत यह सुप्रीम कोर्ट को सौंप दिया। दरअसल, 1987 के फैसले में पंजाब को 50 लाख एकड़ फीट पानी और हरियाणा को 38.3 लाख एकड़ फीट पानी दिया गया था। पंजाब को यह बंटवारा अच्छा नहीं लगा। पंजाब की असहमति के कारण इस फैसले का राजपत्र में प्रकाशन नहीं हुआ। 2004 में तो पंजाब विधानसभा ने कानून ही बना दिया। विस्तार से जानें…

​कृष्णा नदी जल विवाद

कृष्णा नदी के जल पर हक के लिए कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच संघर्ष चल रहा है। इस विवाद पर अभिकरण का निर्णय और रिपोर्ट 30 दिसंबर, 2010 तैयार की गयी थी और 16.9.2011 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, अगले आदेश तक, राज्यों और केंद्र सरकार द्वारा दायर संदर्भों पर ट्रिब्यूनल द्वारा किए गए निर्णय को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित नहीं किया जाएगा। फिलहाल मामला विचाराधीन है। विस्तार से जानें…

​वंशधारा नदी जल विवाद

आंध्रप्रदेश तथा ओडिशा राज्य के बीच 2009 से वंशधारा जल विवाद चल रहा है। आंध्रप्रदेश सरकार वंशधारा और नागावल्ली नदी की इंटरलिंकिंग करना चाहती है। ओडिशा सरकार ने फरवरी 2009 में अंतरराज्‍यीय नदी जल विवाद (ISRWD) अधिनियम, 1956 की धारा 3 के तहत वंशधारा नदी जल विवाद के समाधान के लिए केंद्र सरकार से अंतरराज्यीय जल विवाद अधिकरण के गठन की मांग की। ओडिशा सरकार ने कहा कि आंध्र प्रदेश के कटरागार में वंशधारा नदी पर निर्मित तेज बहाव वाली नहर के निर्माण के कारण नदी का तल सूख जाएगा जिस कारण भूजल और नदी का बहाव प्रभावित होगा। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2009 में केंद्र सरकार को जल विवाद अधिकरण को गठित करने के निर्देश दिया और 2010 में एक ‘जल विवाद अधिकरण’ का गठन किया गया। लेकिन, ओडिशा ने 2013 में अधिकरण के निर्णय के खिलाफ फिर से सुप्रीम कोर्ट का खटखटाया जहां मामला लंबित है। विस्तार से जानें…

​कावेरी जल विवाद

यह विवाद आजादी से पहले से चला आ रहा है। आजादी के बाद नए-नए प्रांत बने। फिर कर्नाटक, तामिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर संघर्ष छिड़ गया। केंद्र सरकार की कावेरी फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने 1973 में अपनी रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट के आधार पर राज्यों के बीच चर्चाओं का दौर चला और 1974 में कावेरी घाटी अथॉरिटी का प्रस्ताव सामने आया। फिर, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 2 जून, 1990 को न्यायमूर्ति सी. मुखर्जी की अध्यक्षता में अभिकरण का गठन हुआ। अभिकरण ने 25 जून 1991 को अपना अंतरिम आदेश दिया। 1997 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कावेरी नदी अथॉरिटी का गठन हुआ। इसके सदस्यों में राज्यों के मुख्यमंत्री भी सम्मिलित हैं। 5 फरवरी, 2007 को कावेरी जल विवाद अभिकरण ने अपना अन्तिम फैसला सुनाया। इस फैसले के अनुसार तमिलनाडु को 419 बिलियन क्यूबिक फीट और कर्नाटक को 270 बिलियन क्यूबिक फीट पानी मिलना तय हुआ है। लेकिन, मामला सुप्रीम कोर्ट में भी है।

​महादाई जल विवाद

महादाई नदी कर्नाटक में भीमगढ़ के पास 30 झरनों के एक समूह से निकलती है और बेलगाम जिले के खानपुर तालुका के देगांव में एक नदी के रूप का रूप ले लेती है। गोवा में इस नदी को गोवा में इसे मनदोवी नदी कहा जाता है। मुख्य रूप से महादाई नदी बारिश पर आश्रित है जो मॉनसून के महीनों के दौरान अपने चरम रूप में बहती है। अरब सागर में प्रवाहित होने से पहले यह नदी कर्नाटक से 35 किमी और गोवा से 52 किमी की दूरी पर बहती है।गोवा की राज्य सरकार ने सितंबर 2002 में इस योजना के विरोध में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था, और दावा करते हुए कहा था कि पानी का कोई भी परिवर्तन गोवा के लोगों को पानी की जरूरतों से वंचित करेगा, पश्चिमी घाट के अत्यधिक संवेदनशील पारिस्थितिकी पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा। गोवा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर एक ट्राइब्यूनल की स्थापना की मांग की जिसकी वजह से न्यायमूर्ति जेएम पांचाल ने 2010 में एमडब्लयूडीटी की स्थापना की। अभी इसकी रिपोर्ट का इंतजार है। विस्तार से जानें…

​नदियों पर क्यों लड़ते हैं राज्य?

भारत नदियों का देश है। गंगा, यमुना, सिंधु, झेलम, ब्यास, ब्रह्मपुत्र, चंबल, केन, बेतवा, नर्मदा, महानदी, सोन, ताप्ती, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा जैसी अनेक नदियां इसकी पहचान हैं। इनमें कुछ नदियों का प्रवाह एक से दूसरे राज्यों में जाता है। वहीं, कुछ नदियों में भरपूर पानी है तो तो कुछ में पानी की मात्रा कम है। सिंधु और ब्रह्मपुत्र तो क्रमशः पाकिस्तान और चीन के भू-भाग में भी हैं।

भारत मॉनसूनी जलवायु का देश है। इस कारण यहां मुश्किल से चार महीने ही बारिश होती है। यानी, आठ महीने तक देश में पानी की आपूर्ति नदियों, नहरों, तालाबों एवं अन्य जलाशयों पर ही निर्भर होती है। स्वाभाविक है कि गर्मियों में स्थानीय जलाशय सूखते हैं और जमीन का जलस्तर नीचे जाता है तो पानी की भयंकर समस्या खड़ी हो जाती है। तब नदियां ही एकमात्र सहारा बचती हैं। वैसे भी दिनचर्या से लेकर खेती-किसानी और आर्थिक उपार्जन तक में पानी की बड़ी भूमिका है। ऐसे में पानी की कमी हो तो राज्यों के बीच क्या परिवार के सदस्य एक-दूसरे से झगड़ पड़ते हैं।

इन जरूरतों के अलावा राज्यों के बीच लड़ाई का एक कारण राजनीतिक भी है। राजनैतिक दल जल बंटवारे के मुद्दे को राज्य की आन-बान-शान से जोड़कर पेश करते हैं जिससे इसकी संवेदनशीलता बढ़ जाती है। हर राज्य और राज्यों के अंदर राजनीतिक पार्टियां इस होड़ में रहती हैं कि कैसे वो जल बंटवारे पर समझौते के दौरान अपने पक्ष में ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी सुनिश्चित कर लें। ऐसे में संवैधानिक और कानूनी तंत्रों के सामने बड़ी चुनौती पेश हो जाती है।

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​अटल बिहारी वाजपेयी की सपना

अटल के शासनकाल में जब देश की 37 नदियों को आपस में जोड़ने का फैसला लिया गया, तो उसमें से एक यह परियोजना भी थी। अटल बिहारी वाजपेयी के सपने को बीजेपी की नरेंद्र मोदी सरकार ने पूरा करने का बीड़ा उठाया है। पीएम मोदी ने सोमवार को कहा कि अटल जी ने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के लाखों परिवारों के कल्याण के लिए जो सपना देखा था, उसके लिए आज केन-बेतवा लिंक परियोजना के लिए समझौता हुआ है। यह समझौता दोनों राज्यों की प्रगति के साथ जनता के लिए कल्याणकारी होगा।


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