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DELHI

on basu chatterjeeमध्यवर्ग को पहचान दिलाने वाले फिल्मकार बासु चटर्जीविनोद कुमारइसे संयोग भी मान – on basu chatterjee filmmaker basu chatterjeevinod kumar, who recognizes the middle class, is also a coincidence

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on basu chatterjee

मध्यवर्ग को पहचान दिलाने वाले फिल्मकार बासु चटर्जी

विनोद कुमार

इसे संयोग भी मान सकते हैं,और एक परंपरा को वहन कर आगे ले जाने के संकेत भी। शैलेन्द्र की राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित फिल्म ‘तीसरी कसम’ से दो बासु जुडे थे।फिल्म के निर्देशन का दायित्व बासु भट्टाचार्य निभा रहे थे,जबकि उनके सहायक के रुप मे जुडे थे बासु चटर्जी। गौरतलब है कि बासु चटर्जी के लिए सिनेमा की दुनिया में यह पहली उपस्थिति थी,वह भी बासु भट्टाचार्य जैसे सख्तजान निर्देशक के साथ। निश्चित रुप से बासु भट्टाचार्य के इस पहले साथ ने सिनेमा के प्रति बासु चटर्जी को समझने की एक बेहतर संवेदनशील दृष्टि दी,जो उनकी पूरी सिनेमाई यात्रा में दिखती रही।

सत्यजीत रे की तरह बासु चटर्जी ने भी अपनी रचनायात्रा इलस्ट्रेटर के रुप में सुरु की।इलस्ट्रेटर होने के साथ साथ मुंबई से प्रकाशित होने वाले उस समय के चर्चित साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ में कार्टून भी बनाते थे, जाहिर है जीवन के प्रति एक व्यंगयात्मक नजरिया जो उन्होंने अपनी लगभग 15 वर्षों की अखबारी दुनिया से हासिल किया, अपने सिनेमा में उन्होंने उसका भरपूर उपयोग किया। जीवन को हल्के फुल्के लेकिन संवेदनशीलता से लेने की उनकी कोशिश का गवाह आज भी उनकी अधिकांश फिल्में हैं,चाहे वह ‘पिया का घर’ हो,या ‘कमला की मौत’ या फिर टेलीविजन धारावाहिक ‘व्योमकेश बख्सी’,जहां तनाव में भी वो सुकून ढूंढ लेते हैं।

सत्यजीत रे और बासु चटर्जी में एक और समानता दिखती है।दोनों ही लेखन की दुनिया से करीब से जुडे रहे। सत्यजीत रे ने अधिकांश फिल्में साहित्यिक कृतियों पर ही बनायी। बासु चटर्जी की भी प्राथमिकता में साहित्य रहा।इसमें एक प्रभाव फणीश्वर नाथ रेणु का भी मान सकते है, ‘तीसरी कसम’ की शूटिंग के दौरान जिनसे बासु का लंबा संग साथ रहा।शायद ही उस समय किसी को अहसास होगा कि लेखक के साथ गिटपिट करता रहता यह सहायक निर्देशक सेल्युलाइट पर समकालीन हिंदी साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण वाहक बनेगा। 1969 में बनी राजेन्द्र यादव के उपन्यास ‘सारा आकाश’ से लेकर अपनी सिनेमाई यात्रा के अंतिम दौर 1997 में शिवमूर्ति की कहानी ‘त्रियाचरितर’ तक लगभग 30 वर्षों के सफर में बासु चटर्जी ने फिल्में तो 30 भी नहीं बनायी,लेकिन जो भी बनायीं उनमें उनका रचनाकार मन पूरी संवेदनशीलता से धडकता दिखता रहा।

यह भी गौरतलब है कि यह वह दौर था जब राजेश खन्ना मध्यवर्गीय युवा के रुप में लोकप्रियता के शिखर पर थे, ‘आनंद’,’आराधना’,’कटी पतंग’ जैसी फिल्में मध्यवर्ग के लिए एक खूबसुरत इमोशनल दुनिया रच रहे थे, दूसरी और अमिताभ बच्चन अपनी पूरी ताकत से युवा आक्रोश को आकार देने उतावले थे।ऐसे में बासु चटर्जी राजेन्द्र यादव की निम्न मध्यवर्गीय युवा के निजी और पारिवारिक जीवन की जद्दोजहद की कहानी ‘सारा आकाश’ को बगैर किसी ग्लैमर के ब्लैक एंड व्हाइट में गुमनाम से चेहरे राकेश पांडे और मधु चक्रवर्ती के साथ पूरी ईमानदारी से दिखाने का जोखिम उठाते हैं।मृणाल सेन के उसी साल आयी ‘भुवन शोम’ के साथ सार्थक सिनेमा का यह प्रस्थान विन्दु बना।’सारा आकाश’ की पटकथा बासु ने खुद लिखी थी,जबकि संवाद कमलेश्वर ने लिखे थे। यह वह सिनेमा था,जिसमें सिनेमा का स्थायी तत्व स्वप्न नहीं था,जो भी,जितना भी था,जीवन था। यह वह सिनेमा था,जिसमें जीवन मूल्य थे,संवेदना थी और जीवन को यथावत दिखाने की ईमानदारी।विचारों और विचारधाराओं से परे जीवन को उसकी खूबसूरती से देखने वाले सिनेमा की शुरुआत थी यह।

बासु चटर्जी की फिल्मों की खासियत थी कि उसमें दर्शकों का दवाब नहीं दिखता था।बासु अपनी कहानी,अपने चरित्र के प्रति ईमानदार दिखते थे। व्यंग्य बासु की फिल्मों की पहचान बनी, लेकिन अपने व्यंग्य को कभी उन्होंने अपनी कहानी पर हावी नहीं होने दिया। ‘खट्टा मीठा’, ‘बातों बातों में’, ‘मनपसंद’, ‘शौकीन’, ‘चमेली की शादी’ जैसी फिल्मों में दैनंदिनी जीवन के बीच से हास्य के तत्व वे जिस तरह ढूंढ लाते हैं, हिंदी दर्शकों को आज भी विस्मित करता है।हृषिकेश मुखर्जी की परंपरा में न भी कहें,उनके साथ मिल कर जीवन सौंदर्य के निर्वहन के साथ हास्य का एक नया आस्वाद हिंदी दर्शकों को दिया।

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लेकिन बासु इससे परे भी थे, ‘रजनीगंधा’, ‘चितचोर’, ‘पिया का घर’, ‘स्वामी’ या फिर ‘कमला की मौत’,हरेक फिल्म के साथ वासु एक नई पहचान के साथ दिखते थे,इतने परिपक्व कि आज यह तय करना वाकई मुश्किल है कि हमारे लिए कौन से बासु अधिक महत्वपूर्ण होंगे,’रजनीगंधा’ के,या ‘चितचोर’ के।’सारा आकाश’ के या ‘कमला की मौत’ के। सिर्फ एक पहचान उनकी सभी फिल्मों के साथ जुडी रही,हिंदी प्रदेश का मध्यवर्ग, चाहे वह ‘पिया का घर’ और ‘बातों बातों में’ के नौकरी पेशा के रुप में हो,या फिर ‘चमेली की शादी’ के छोटे व्यवसायी के रुप में।

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बासु के बारे में कहा जाता है फिल्में भी वे मध्यवर्ग की ही तरह बहुत ही कसे बजट में बनाया करते थे।यहां तक कि कई बार शूटिंग में तो वे कलाकारों को घर से ही अपने कपडे पहन कर आने कह देते थे। उनके लिए अभिनेता कभी महत्वपूर्ण नहीं रहे,चरित्र महत्वपूर्ण रहा,फिर जो अभिनेता मिला उससे ही उन्होंने परफेक्शन हासिल किया,चाहे वह अनिल धवन हो,या जरीना वहाब,अनिल कपूर हों या देव आनंद। उनका जाना हिंदी सिनेमा में मध्यवर्ग की सबसे इमोशनल पहचान का जाना है।याद किया जाता रहेगा कभी हिंदी में कोई फिल्मकार था,जिसने हिंदी मध्यवर्ग को अपने पूरी संस्कृति सौंदर्य और जीवन मूल्यों के साथ सिनेमा के परदे पर पहचान दिलाई थी।

[email protected]

विनोद अनुपम,टेली- 094724 77941

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