INDIA

politics of patriotism – NavBharat Times Blog

लेखकः उदित राज
रामलीला मैदान पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे के आंदोलन में ‘भारत माता की जय’ के नारे खूब गूंजे। आजादी के आंदोलन में भी भारत माता की जय-जयकार घर-घर गूंजती थी। सोए हुए लोगों को जगाने के लिए इस प्रतीक की उस समय बहुत उपयोगिता थी। जब देश दूसरे के अधीन था तो देश का शासन-प्रशासन चलाने का अवसर ही नहीं था। आजादी हासिल हो जाने के बाद देश निर्माण में आत्मावलोकन और आत्मचिंतन की जरूरत है। लेकिन संघ और बीजेपी ने राष्ट्रीय प्रतीकों का अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए खूब उपयोग किया। देशहित में नहीं बल्कि सत्ता पर पकड़ जमाने के लिए उसने इसको अपना हथियार बना लिया। स्थिति यह होती जा रही है कि जो भी सरकार की किसी खामी पर उंगली उठाए वह देशद्रोही घोषित हो जाता है।

जीत कैसे होगी
भारतीय जनता पार्टी के कार्यक्रमों का समापन ही नहीं, शुरुआत भी भारत माता की जय के नारों से होती है। आम जनता इस प्रतीक से भावनात्मक रूप से जुड़ जाती है। दूरदर्शन पर आने वाले ‘भारत एक खोज’ के एक एपिसोड में नेहरू ने खुद को घेरे हुए भीड़ से माकूल प्रश्न किया है, ‘जो भारत माता की जय का नारा लगा रहे हो, क्या मतलब समझते हो उसका? जहां खड़े हो उस धरती की जय या उस गांव की, पूरे इलाके की या फिर देश की धरती की जय?’ नेहरू जी आगे कहते हैं, ‘नदी-पहाड़ भी तो हैं। इन्हें भी शामिल कर लेते हैं।’ फिर पूछते हैं कि ‘किसकी जीत चाहते हो?’ अंत में भीड़ को समझाते हैं, ‘लोगों से देश बनता है। लोगों की जीत ही उद्देश्य है। जिस समाज और देश में लोग शोषित हों, भेदभाव के शिकार हों वहां कैसे भारत माता की पूर्ण जीत संभव है?’

बीजेपी जिस संदर्भ में यह नारा लगाती है, उसमें सबकी जीत नहीं है। वैसे भी बहुसंख्या में इस प्रतीक के समर्थक वे हैं जो अभाव और भेदभाव की जिंदगी जी रहे हैं। भारत माता की जय का मतलब है कि सभी सुखी हों। महिला, दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक सभी। अगर समाज में किसी तरह की असमानता है तो उसे खत्म करने का प्रयास हो। इसके विपरीत नारेबाजी का मकसद माहौल को भावुक करना और मूलभूत आवश्यकताओं से ध्यान बांटना लगता है। उत्तर प्रदेश में 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने एक भी मुस्लिम प्रत्याशी नहीं खड़ा किया। 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव में भी यही हुआ। ऐसे में भारत माता की जय के नारे का क्या मतलब हुआ? भारत माता की जीत में क्या 15 फीसद मुस्लिम आबादी की कोई भूमिका नहीं है? इस नारे से अधिकांश लोग भावुक और उत्साहित जरूर हो जाते हैं लेकिन सवाल इसका अर्थ समझने का है।

डॉ. बीआर आंबेडकर, ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु, पेरियार, शाहूजी महाराज, संत गाडगे आदि महापुरुषों ने भारत माता की जय के नारे नहीं लगाए। लेकिन क्या ये लोगों की जीत अर्थात उनके अधिकार के लिए नहीं लड़े? सचाई यह है कि महिलाओं, दलितों और पिछड़ों के उत्थान में इनका योगदान औरों से कहीं ज्यादा रहा है। ऐसे में इन्हें कहां खड़ा करेंगे? क्या इन्हें अपनी मातृभूमि से प्रेम नहीं था? जरा सोचिए कि किसी के करीबी की हत्या हो जाए, किसी का बलात्कार हो जाए या कोई बेहद अपमानजनक भेदभाव का शिकार हुआ हो तो उसके मन में क्या चल रहा होगा? क्या वह जिस स्थान पर वह खड़ा है उस जमीन की या आसपास के इलाके की जीत की कामना करेगा, या सब कुछ भूलकर न्याय पाने का प्रयास करेगा?

जाहिर है, उसकी प्राथमिकता यही होगी कि दोषी को सजा मिले। अगर ऐसा होता है तभी उसके लिए भारत माता की जय का कोई मतलब है। मगर देशभक्ति आजकल ऐसा तकिया कलाम बन गया है मानो यह मात्र एक शब्द हो, लोगों को भावुक बनाने वाला। और यह कमाल केवल बीजेपी तक सीमित नहीं है। आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार ने और भी कट्टर देशभक्ति का बजट पेश कर दिया। उसे लगता है कि बीजेपी देशभक्त बनने का संदेश देकर सत्ता में आ गई तो अब उतने से काम नहीं चलेगा। कट्टर देशभक्त वाली स्थिति प्राप्त करने के लिए लंबे आकार के 500 राष्ट्रीय ध्वज दिल्ली में लगाए जाने हैं। आते-जाते लोग झंडे को देखेंगे तो राष्ट्रभक्ति की भावना उनमें हिलोरें मारेंगी। भारतीय जनता पार्टी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय ध्वज लगाने के लिए निर्देशित कर ही चुकी है।

जेएनयू में तो टैंक ही खड़ा कर दिया गया। अब कोई सरकार की नीतियों के खिलाफ बोले तो वह आसानी से देशद्रोही करार दिया जाएगा। असल में इन लोगों की भारत माता की जय में न तो भारत माता की जीत है और ना ही देशभक्ति है। भारत माता की जय बोलने का असली हकदार वह है जो सभी को एक दृष्टि से देखे और जाति-धर्म के आधार पर भेदभाव न करे। इसी से लोगों की जीत होगी। असली देशभक्त वही हो सकता है, जो अन्याय, अत्याचार के खिलाफ लड़े और सड़ी-गली परंपराओं, पुरातनपंथी रीति-रिवाजों का त्याग करे। जो ऐसा करेगा वही देश के विकास में योगदान दे सकेगा। देशभक्त होने के लिए यह भी जरूरी है कि वह सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करे और समाज में व्याप्त रूढ़िवाद तथा शोषण के खिलाफ खड़ा हो।

गलत को गलत कहना
जिन देशों ने तरक्की की है और जहां पर क्रांतियां हुई हैं, वहां गलत को गलत कहा गया है। वर्तमान स्थितियों में जो लोग देशभक्त होने का दावा कर रहे हैं, उनका कृत्य इसके विपरीत है। जब तक व्यक्ति की आजादी और खुली अभिव्यक्ति सुनिश्चित नहीं होगी, लोगों की मूलभूत समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तब तक राष्ट्र उनके लिए धरती का एक टुकड़ा ही रहेगा। जब आम नागरिक को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध होंगी तभी वह बेहतर समाज का निर्माण कर पाएगा। समाज खुशहाल होगा तभी स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण संभव है। समाज की संपन्नता ही स्थायी रूप से राष्ट्र की अखंडता तथा संप्रभुता को सुनिश्चित कर सकती है।

(लेखक कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व सांसद हैं)

Related Articles

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं




Source link

Show More

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *