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Review Of Indira Sawhney vs Union Of India Verdict (Mandal Commission) Needed Or Not, Supreme Court Starts Hearing – मंडल जजमेंट को दोबारा देखने की जरूरत है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू

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सुप्रीम कोर्ट
रिजर्वेशन मामले में इंदिरा साहनी जजमेंट यानी मंडल जजमेंट को दोबारा देखने की जरूरत है या नहीं और क्या मंडल जजमेंट को लार्जर बेंच में रेफर करने की जरूरत है या नहीं, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने सुनवाई शुरू कर दी। इस दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि मंडल जजमेंट को दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं है। गौरतलब है कि मंडल जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक बेंच ने फैसला दिया था कि रिजर्ववेशन 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता और 50 फीसदी की लिमिट फिक्स कर दी थी।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अशोक भूषण की अगुवाई वाली बेंच के सामने मामले की सुनवाई हुई इस दौरान कुछ राज्यों ने अपना जवाब दाखिल करने के लिए कुछ और वक्त देने की मांग की जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को एक हफ्ता का वक्त देते हुए जवाब दाखिल करने को कहा।

याचिकाकर्ता का क्‍या था कहना?
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील अरविंद दत्तार ने कहा कि 1992 में सुप्रीम कोर्ट के लार्जर बेंच ने इंदिरा साहनी से संबंधित वाद में जो फैसला दिया था उस पर दोबारा से विचार करने की जरूरत नहीं है। याचिकाकर्ता के वकील की दलील थी कि 50 फीसदी लिमिट इंदिरा साहनी यानी मंडल जजमेंट में तय किया गया था और उस मामले को दोबारा देखने के लिए मामले को 11 जजों को रेफर करना होगा और इसकी जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के गठन के बाद से सिर्फ पांच दफा ऐसा हुआ जब 11 जजों की बेंच का गठन हुआ और ये बेहद जरूरी मसलों पर हुआ है। यहां सवाल सिर्फ इतना है कि क्या रिजर्वेशन देने के लिए 50 फीसदी की जो सीमा तय की गई है उसका उल्लंघन किया जा सकता है क्या। 1992 में जो इंदिरा साहनी केस में जजमेंट हुआ था वह कई मसलों पर था। वह फैसला काफी विचार और दलील के बाद सुनाया गया था।

राज्‍यों का एक हफ्ते का वक्‍त और मिला
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के उस आग्रह को स्वीकार कर लिया कि जवाब के लिए कुछ और वक्त दिया जाए और अदालत ने राज्यों को एक हफ्ते का वक्त दे दिया। इसी दौरान केरल राज्य के वकील ने कहा कि मामले की सुनवाई टाली जानी चाहिए क्योंकि राज्यों में विधानसभा चुनाव है। सुप्रीम कोर्ट ने केरल राज्य के वकील की दलील को खारिज कर दिया और कहा कि हम चुनाव के कारण सुनवाई नहीं टाल सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 102 वें संशोधन के मामले में फैसला जरूरी है क्योंकि हर राज्य इससे प्रभावित होगा। सुप्रीम कोर्ट में तामिलनडु के वकील शेखर नाफडे ने कहा कि अदालत को इस बात को भी देखना होगा कि 50 फीसदी से ज्यादा रिजर्वेशन किन परिस्थितियों में दिया गया है।

आठ मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह इस बात का परीक्षण करेगा कि क्या 1992 में दिए गए इंदिरा साहनी जजमेंट को दोबारा देखने की जरूरत है या नहीं, क्या इंदिरा साहनी जजमेंट को लार्जर बेंच भेजे जाने की जरूरत है या नहीं इस बात को सुप्रीम कोर्ट देखेगा। सुप्रीम कोर्ट ने मराठा रिजर्वेशन मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि वह इस बात का परीकक्षण करेगा कि क्या रिजर्वेशन मामले में 50 फीसदी की सीमा तय करने वाले इंदिरा साहनी जजमेंट यानी मंडल जजमेंट के फैसले को दोबारा देखने की जरूरत है या नहीं?

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से पूछा, क्‍या 50% से ज्‍यादा हो सकती है आरक्षण की सीमा?

सुप्रीम कोर्ट ने ये समझने की कोशिश की है कि क्या 1992 में इंदिरा साहनी जजमेंट में रिजर्वेशन के लिए तय 50 फीसदी सीमा के बाद जो संवैधानिक संशोधन हुए हैं और जो सामाजिक व आर्थिक बदलाव हुए हैं उसके मद्देनजर जजमेंट का दोबारा परीक्षण हो सकता है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने तमाम राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा था कि क्या रिजर्वेशन की जो मौजूदा ऊपरी सीमा 50 फीसदी है उसको पार करने की अनुमति दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान तमाम राज्यों से जवाब दाखिल करने को कहा था कि क्या विधायिका इस बात को लेकर सक्षम है कि वह रिजर्वेशन देने के लिए किसी जाति विशेष को सामााजिक और शैक्षणिक रूप से बैकवर्ड घोषित कर सके।

102वें संशोधन की व्‍याख्‍या पर भी सवाल
सुप्रीम कोर्ट 102 संशोधन के व्याख्या के सवाल को भी देखेगी जिसमें विशेष कम्युनिटी को रिजर्वेशन देने का प्रावधान है और उसका नाम राष्ट्रपति द्वारा बनाए गए लिस्ट में होता है।102 संशोधन में 2018 में अनुच्छेद 338 बी (राष्ट्रीय बैकवर्क क्लास आयोग के स्ट्रक्चर, ड्यूटी और पावर) को जोड़ा गया था साथ ही अनुच्छेद342 ए (राष्ट्रपति को अधिकार दिया गया कि वह किसी भी जाति विशेष को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से बैकवर्क क्लास (एसईबीसी) के तौर पर नोटिफाई करें) का प्रावधान किया गया। साथ ही संसद को अधिकार दिया गया कि वह एसईबीसी लिस्ट में बदलाव कर सकें। सोमवार को राज्यों की ओर से कहा गया कि उन्हें जवाब के लिए और वक्त चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें एक हफ्ते का और वक्त दे दिया है।


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